Sunday, 14 June 2020

“मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र” के नाम पर बाँटे जा रहे अज्ञान, मूर्खता और झूठ का आलोचनात्‍मक विवेचन - पांचवी किश्‍त


इस तरह आत्‍मग्रस्‍त मूढ़ता के रथ ने रौंद दिया बौद्ध दर्शन और इतिहास को
(अशोक कुमार पाण्‍डे द्वारा मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र में फैलायी जा धुन्‍ध का आलोचनात्‍मक विवेचन)
(पांचवी किश्‍त)
·        हण्‍ड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्‍ट स्‍टडी ग्रुप, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, दिल्‍ली

अब हम पाण्‍डे जी के पांचवे वीडियो की आलोचनात्‍मक विवेचना पर आते हैं।
पाण्‍डे जी पांचवे वीडियो में थोड़ा 'कांशस' हो गये हैं। हालांकि इस सचेत होने और नरभसाने को उन्‍होंने आक्रामकता के पर्दे में छिपाने की काफी कोशिश की है। लगभग आधे घण्‍टे के वीडियो में पाण्‍डे जी ने कम-से-कम 15 मिनट हवाबाज़ी पर खर्च किये हैं। जैसा कि हमने पहले भी बताया है, पाण्‍डे जी के वीडियो चिप्‍स के पैकेट के समान होते हैं। उसमें सड़े चिप्‍स के अलावा आधी जगह बदबूदार गैस भरी होती है। यह वीडियो भी इस आम नियम का अपवाद नहीं है। पाण्‍डे जी काम की बात करने की बजाय बार-बार हमें याद दिलाते हैं कि उनसे गलती हो सकती है, उन्‍हें ठीक किया जाय, क्‍योंकि सीखना तो एक दो-तरफा प्रक्रिया होती है; कई लोग गुरू-घण्‍टालों के समान जटिल शब्‍दावली में बात करते हैं, मार्क्‍स व हेगेल वगैरह को कोट करते हैं, और अपने ज्ञान से लोगों को आतंकित करते हैं, यह तो कोई मार्क्‍सवादी तरीका नहीं है। पूंजीवादी राज्‍यसत्‍ता के एक चाकर के रूप में पाण्‍डे जी बिल्‍कुल पूंजीवादी राज्‍यसत्‍ता जैसी ही बातें कर रहे हैं! जब पूंजीवादी राज्‍यसत्‍ता किसी से आतंकित होती है, तो वह सबके लिए ही उस चीज़ को आतंककारी बता देती है! उसी प्रकार पाण्‍डे जी जिन आलोचनाओं से आतंकित हो गये हैं, उन्‍हें बौद्धिक आतंककारी करार देने की कोशिश कर रहे हैं! उनका कहना है कि इनको पढ़कर कुछ समझ नहीं आता है, बस आतंक पैदा होता है! अपने आतंकित होने को वह पूरे हिन्‍दी जगत पर ही आरोपित किये दे रहे हैं। कोई ताज्‍जुब की बात नहीं है, ज्‍यादातर मूर्खों को यह लगता ही है कि सभी मूर्ख हैं।

“मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र” के नाम पर बाँटे जा रहे अज्ञान, मूर्खता और झूठ का आलोचनात्‍मक विवेचन - चौथी किश्‍त

पाण्‍डे के प्रवचन से और गहराया जहालत का अंधेरा
(अशोक कुमार पाण्‍डे द्वारा मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र में फैलायी जा रही धुन्‍ध का आलोचनात्‍मक विवेचन)
(चौथी किश्‍त)
·         हण्‍ड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्‍ट स्‍टडी ग्रुप, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, दिल्‍ली

पिछले तीन वीडियो में हम देख चुके हैं कि पाण्‍डे जी की मार्क्‍सवाद की समझदारी कितनी है और थोड़ा मुज़ाहिरा हमने इस बात का भी देखा कि उन्‍हें भारतीय दर्शन के बारे में क्‍या पता है। इस वीडियो में हम इस तकलीफदेह सफर को जारी रखेंगे और अधिक विस्‍तार से देखेंगे कि पाण्‍डे जी भारतीय दर्शन के बारे में क्‍या समझदारी रखते हैं।
पाण्‍डे जी हमेशा की तरह शुरुआत कुछ लोगों द्वारा पूछे गये सवालों का जवाब देने से करते हैं। किसी ने उनसे पूछा है कि मार्क्‍स यूरोपीय परिस्थितियों में पैदा हुए थे और उनकी चेतना और ज्ञान भी उसी के अनुसार निर्धारित हुआ था। भारतीय चेतना तो भारतीय परिस्थितियों के अनुसार बनेगी, तो ऐसे में मार्क्‍स के सिद्धान्‍तों को, जो कि यूरोपीय परिस्थितियों के अनुसार बने हैं, भारत में कैसे लागू किया जा सकता है।
सवाल तो यह किसी नये युवा साथी के अनुसार अच्‍छा है और इसका बहुत ही अच्‍छा जवाब दिया जा सकता है। लेकिन जब तक आप ऐसा सोचते हैं, तब तक पाण्‍डे जी अपनी मूर्खता का उस्‍तरा सवाल पूछने वाले के मस्तिष्‍क को गंजा करने के लिए अपने झोले में से निकाल चुके होते हैं। आइये देखते हैं कि वह इस सवाल का क्‍या जवाब देते हैं।

“मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र” के नाम पर बाँटे जा रहे अज्ञान, मूर्खता और झूठ का आलोचनात्‍मक विवेचन - तीसरा भाग

''ज्ञान-धुरन्‍धर'' पाण्‍डे ने भारतीय दर्शन का कचड़ा कैसे किया?
(अशोक कुमार पाण्‍डे द्वारा मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र में फैलायी जा धुन्‍ध का आलोचनात्‍मक विवेचन)
(तीसरा भाग)
·        हण्‍ड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्‍ट स्‍टडी ग्रुप, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, दिल्‍ली

अब हम पाण्‍डे जी के मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्रके तीसरे वीडियो पर आते हैं।
तीसरे वीडियो की शुरुआत में ही पाण्‍डे जी बताते हैं कि किताबें पढ़ने का कोई विकल्‍प नहीं है और इस अध्‍ययन चक्र के ज़रिये उनका मकसद केवल मार्क्‍सवाद की एक मोटी समझदारी बनानी है और माहौल बनाना है। हम पहली दो किश्‍तों में देख चुके हैं कि पाण्‍डे जी कैसा माहौल बना रहे हैं। बल्कि कहना चाहिए कि यह व्‍यक्ति हिन्‍दी जगत में जो थोड़ा माहौल है मार्क्‍सवाद को जानने-समझने का, उसे भी खराब कर रहा है।
तीसरे वीडियो में भी इसने बुरी तरह से माहौल खराब किया है। आइये देखते हैं।

“मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र” के नाम पर बाँटे जा रहे अज्ञान, मूर्खता और झूठ का आलोचनात्‍मक विवेचन - दूसरा भाग


मार्क्‍सवाद के एक आत्‍मग्रस्‍त अज्ञानी ''शिक्षक'' द्वारा मार्क्‍सवाद के विकृतीकरण के विरुद्ध
(अशोक कुमार पाण्‍डे द्वारा मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र में फैलायी जा रही धुन्‍ध का आलोचनात्‍मक विवेचन)
(दूसरा भाग)

·        हण्‍ड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्‍ट स्‍टडी ग्रुप, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, दिल्‍ली

अब हम पाण्‍डे जी के “मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र” के दूसरे वीडियो पर आते हैं।
पहले वीडियो में पाण्‍डे जी ने जिस अज्ञानता प्रसार का आरम्‍भ किया था, उसे वह दूसरे वीडियो में भी जारी रखते हैं।
दूसरे वीडियो में शुरुआत में ही पाण्‍डे जी एक किताब का नाम सुझाते हैं जिसे पढ़ना चाहिए। वह कहते हैं कि के. दामोदरन की एक पुस्‍तक है 'भारतीय दर्शन में क्‍या जीवित क्‍या मृत'। पहली बात तो यह है कि यह पुस्‍तक देवीप्रसाद चट्टोपाध्‍याय की है, न कि के. दामोदरन की। सम्‍भवत: बाद में पाण्‍डे जी को किसी ने इस गलती के बारे में बताया होगा, तो आगे के वीडियो में वह इसे ठीक करते हुए कहते हैं कि वह पुस्‍तक तो देवीप्रसाद चट्टोपाध्‍याय की है, के. दामोदरन की पुस्‍तक का नाम है 'भारतीय दर्शन परम्‍परा'यही इनकी अदा है! यह अगर कोई गलती भी ठीक करने चलते हैं, तो दूसरी ग़लती किये बिना ऐसा नहीं कर पाते। के. दामोदरन की पुस्‍तक का नाम 'भारतीय दर्शन परम्‍परा' नहीं है, बल्कि 'भारतीय चिन्‍तन परम्‍परा' है, जो पहली बार 1967 में अंग्रेजी में 'Indian Thought: A Critical Survey' के नाम से प्रकाशित हुई थी। लेकिन पाण्‍डे जी का अन्‍दाज़ ही कुछ ऐसा है!

“मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र” के नाम पर बाँटे जा रहे अज्ञान, मूर्खता और झूठ का आलोचनात्‍मक विवेचन - पहला भाग


एक करियरवादी, आत्‍मग्रस्‍त, अपढ़ बौद्धिक बौने द्वारा मार्क्‍सवाद के विकृतीकरण और इसे लेकर फैलायी जा रही धुन्‍ध के विरुद्ध
(अशोक कुमार पाण्‍डे द्वारा “मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र” के नाम पर बाँटे जा रहे अज्ञान, मूर्खता और झूठ का आलोचनात्‍मक विवेचन)
(पहला भाग)

– हण्‍ड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्‍ट स्‍टडी ग्रुप, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, दिल्‍ली

विज्ञान का मसला एक गम्‍भीर मसला होता है। इसमें व्‍यक्तिवाद, करियरवाद, आत्‍मग्रस्‍तता की कोई गुंजाइश नहीं होती है। मार्क्‍सवाद पर कोई भी विमर्श एक वैज्ञानिक विमर्श होता है जो यह माँग करता है कि आप जो भी कहें उसे तथ्‍यों और तर्कों से पुष्‍ट करें और साथ ही उन तथ्‍यों और तर्कों की एक सही व्‍याख्‍या पेश करें। मार्क्‍सवाद एक विश्‍व-दृष्टिकोण है, एक पहुँच और पद्धति है जो हमें हर वस्‍तु अथवा परिघटना को देखने का नज़रिया देता है। साथ ही, यह समाज की गति के नियमों की एक सुस्‍पष्‍ट समझदारी पेश करता है और बताता है कि आज तक समाज का विकास गति के किन नियमों के अधीन हुआ है और आगे उसके विकास की क्‍या सम्‍भावित दिशाएँ हो सकती हैं। यह क्रान्ति का विज्ञान है।

Tuesday, 22 December 2015

'जाति उन्मूलन और बी.आर. अम्बेडकर की विरासत' विषय पर आयोजित व्‍याख्‍यान के वीडियो

मुख्‍य वक्‍ता अभिनव सिन्‍हा का व्‍याख्‍यान 

व्‍याख्‍यान पर श्रोताओं की टिप्‍पणियां


श्रोताओं की टिप्‍पणियों का मुख्‍य वक्‍ता द्वारा जवाब


Monday, 7 December 2015

निमंत्रण - ‘‘जाति उन्मूलन आणि आंबेडकरांचा वारसा’’ या विषयावरील व्याख्यान

मित्रहो,
जात हे भारतातील सामाजिक व आर्थिक जीवनाच्या विविध पैलूंना वेगवेगळ्या प्रकारे प्रभावित करणारे वास्तव आहे, असे म्हणणे ही खरे तर पुनरूक्ती ठरेल. जॉर्जिओ अगांबेन यांच्या शब्दांत सांगायचे झाल्यास भारतीय समाजातील कष्टकरी दलित म्हणजे ‘‘होमो सेसर’’ होत. अलीकडच्या काळात आपण पाशवी दलितविरोधी अत्याचारांचा अनुभव घेतला असून या बहुतेक प्रकरणी गुन्हेगार निर्दोष सुटले आहेत. दशकांपूर्वीचे बथानी टोला हत्याकांडाचे प्रकरण तसेच अलीकडची भगाणाची घटना यांनी हेच दाखवून दिले आहे. ‘‘सकारात्मक कृती’’ नंतरही (अर्थातच ही सकारात्मक कृती आत्यंतिक सदोष आहे) ९१ टक्के दलित जनता परिघावर जगते आहे, व ती शहरी आणि ग्रामीण कष्टकरी जनतेचा लक्षणीय हिस्सा आहे. सुमारे गेली दोन दशके सरकारी नोकऱ्यांच्या संख्येत घट होऊ लागल्यापासून (त्याआधीसुद्धा सरकारी नोकऱ्यांच्या वाढीचा दर जेमतेमच होता), या सकारात्मक कृतीचा प्रश्न अधिकच गैरलागू ठरला असून तो नव्या शक्यतांची याचना करतो आहे.

मोदी सरकार सत्तेत आल्यापासून दलित विरोधी अत्याचारांच्या घटना तसेच धार्मिक अल्पसंख्याकांच्या हत्यांना ऊत आला आहे. त्याचबरोबर उजव्या शक्ती आपल्या राजकीय फायद्यासाठी आंबेडकरांचा वारसा आणि आंबेडकरांचे प्रतीक आपलेसे करण्याचा आटापिटा करीत आहेत. कोणतीही विचारी व्यक्ती तिला आंबेडकरांचे राजकीय विचार आणि जाति उन्मूलनासाठीचे त्यांचे धोरण मान्य असेल वा नसेल- हे नक्कीच समजू शकते की आंबेडकरांच्या भगवाकरणाची भगव्या टोळीची ही धडपड धादांत असत्य आणि ‘‘गोबेल्स’’छाप प्रचारावर बेतलेली आहे. आपण अशा काळात जगतो आहोत जेव्हा जातीचा प्रश्न फक्त दलित व अन्य दमित जातींच्या उन्नयनाच्या दृष्टीनेच नव्हे तर सध्याच्या फासिस्ट लाटेच्या विरोधात प्रतिकार उभा करण्यासाठी तसेच क्रांतिकारी सामाजिक राजकीय परिवर्तनाच्या एकूण प्रकल्पाच्या दृष्टीनेसुद्धा कधी नव्हे इतका महत्त्वाचा बनला आहे. येणारे दिवस दोन शक्यतांना जन्म देतील एक, क्रांतिकारी शक्यता, दुसरी प्रतिक्रियावादी शक्यता. क्रांतिकारी शक्ती क्रांतिकारी शक्यतांचा लाभ घेण्यात अपयशी ठरल्या तर त्यातून अधिक भयकारी आणि आक्रमक फासिस्ट प्रतिक्रिया जन्मास येईल, व परिणामी श्रमिकांच्या अधिकारांवर, नागरी हक्कांवर हल्ले, तसेच दलित, धार्मिक अल्पसंख्याक व स्थलांतरितांवरील अत्याचार वाढीस लागतील. म्हणूनच, अन्य प्रश्नांबरोबरच जाति-उन्मूलनाच्या प्रश्नावर कोणत्याही पोथिनिष्ट संकुचित दृष्टिकोनाशिवाय व ‘‘सांप्रदायिक’’ भावनेशिवाय गांभिर्याने विचार करणे पुरोगामी शक्तींसाठी गरजेचे आहे.
जाति-उन्मूलनाच्या प्रश्नाचा विचार करताना आंबेडकरांचा वारसा, त्यांचे योगदान यांचेही चिकित्सक विश्लेषण होणे आवश्यक आहे, हे वेगळे सांगण्याची गरज नाही. आंबेडकरांच्या प्रश्नावरून जातिविरोधी चळवळीत नेहमीच तट पडत आले आहेत. आंबेडकरवादी चळवळीच्या एका हिश्शाने आंबेडकरांना, त्यांच्याच विचारांच्या विरूद्ध जाऊन, ‘‘पूजनीय’’ बनविले आहे, तर क्रांतिकारी कम्युनिस्ट चळवळ, अगदी गेल्या शतकाच्या सुरुवातीच्या काळापासून भूमिहीन दलितांसाठी धैर्यशील लढे उभारूनदेखील, जातीचा प्रश्न त्याच्या ऐतिहासिकतेसह व त्याच्या राजकीय आर्थिक पैलूंसह समग्रपणे समजून घेण्यात कमी पडली आहे. आंबेडकर आणि त्यांचे राजकारण यांच्याशी विचित्र नाते जोडण्यास हे अपयश कारणीभूत ठरले आहे.
अनेक खऱ्याखोट्या कारणांमुळे आंबेडकरांचे प्रतीक वलयांकित बनलेले असल्यामुळे, कामगार वर्गाच्या चऴवळीच्या दृष्टीने आंबेडकरांचे राजकीय विचार व आचार यांचे वैज्ञानिक आणि संतुलित चिकित्सक मूल्यमापन होणे ही काळाची गरज आहे. भारताच्या क्रांतिकारी परिवर्तनाच्या प्रकल्पासाठी आवश्यक असलेले, कामगार चळवळ आणि दलितमुक्ती चळवळ यांचे एका भांडवलशाहीविरोधी-जातिविरोधी लढ्यात एकीकरण होण्यात अडथळा ठरणारी कोंडी त्याशिवाय फुटू शकणार नाही. आजच्या भांडवली सत्तेचे एक जेंडरआहे, आणि तिची एक जातही आहे, हे कोणत्याही गंभीर सामाजिक शास्त्रज्ञास पक्के ठाऊक आहे.
याच जाणिवेतून, कामगार चळवळीतील एक कार्यकर्ता आणि स्वतंत्र संशोधक व मजदूर बिगुल या मासिकाचे संपादक अभिनव सिन्हा यांच्या ‘‘जाति उन्मूलन आणि आंबेडकरांचा वारसा’’ या विषयावरील व्याख्यानास पोलेमिक आपणास निमंत्रण देत आहे. व्याख्यानानंतर वक्‍त्‍यांसोबत चर्चा होईल. सर्व विद्यार्थी, शिक्षक, प्रागतिक बुद्धिजीवी, राजकीय कार्यकर्ते यांना आमचे हार्दिक निमंत्रण आहे.
क्रांतिकारी अभिवादनासह,

पोलेमिक कलेक्टिव्ह (मुंबई)